सन् 2020 तक चीन अपने विद्युत परिदृश्य में आश्चर्यजनक परिवर्तन करेगा। उसका लक्ष्य संसार की 20 प्रतिशत बिजली के उत्पादन एवं खपत करने का है। उस समय तक वह 1400 से 1500 गीगावाट बिजली का उत्पादन करने लगेगा। जबकि भारत ने अपने लिये अभी सन् 2012 तक का ही लक्ष्य निर्धारित किया है। इस अवधि में भारत की विद्युत उत्पादन क्षमता में केवल 78 गीगावाट बिजली की वृध्दि होगी।
आज चीन संसार का सबसे बड़ा पवन विद्युत उत्पादक देश है और अगले 12 वर्षों में वह इतनी पवन बिजली उत्पादन क्षमता अर्जित कर लेगा कि दुनिया को कोई भी देश उसका मुकाबला नहीं कर सकेगा। उसका लक्ष्य 30 गीगावाट पवन बिजली उत्पादन क्षमता अर्जित करने का है। सौर ऊर्जा के मामले में चीन दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश है। वह अपने पश्चिमी हिस्से के ग्रामीण क्षेत्रों में सौर ऊर्जा को तेजी से विकसित कर रहा है। कहा जा रहा है कि चीन की सारी छतें सौर ऊर्जा उत्पादक छतों में बदल जायेंगी।
जल विद्युत पैदा करने के मामले में चीन संसार में दूसरे नम्बर पर आता है। चीन में प्रतिवर्ष 328 बिलियन किलोवाट आवर्स बिजली जल विद्युत के रूप में प्राप्त की जा रही है। वर्तमान में वह 700-700 मेगावाट की कुल 26 जल विद्युत उत्पादक इकाईयों का निर्माण कर रहा है जिनकी कुल क्षमता 18.2 गीगावाट होगी। इनमें से कुछ इकाईयाँ पूरी हो चुकी हैं।
इन परियोजनाओं के पूरा होते ही चीन में संसार के सबसे बड़े बांधों की एक शृंखला का निर्माण होगा जिन पर 15.8 गीगावाट विद्युत उत्पादन क्षमता की 25 इकाइयाँ लगाई जायेंगी। इस प्रकार चीन संसार भर में जल विद्युत उत्पादन करने के मामले में सबसे आगे निकल जायेगा। चीन के इस कदम से भारत में चीन की ओर से बहकर आने वाली अधिकांश नदियों का पानी चीन में ही रोक लिया जायेगा जिससे भारत की पन बिजली उत्पादन की क्षमता में गिरावट आयेगी तथा भारत की बहुत बड़ी आबादी के लिये पेयजल एवं सिंचाई जल का अभाव उत्पन्न हो जायेगा।
वर्तमान में चीन में 83.3 ट्रिलियन क्यूबिक फीट गैस के भण्डार खोजे जा चुके हैं किंतु वह प्रतिवर्ष केवल 1.3 ट्रिलियन क्यूबिक फीट गैस का खनन कर रहा है। चीन संसार का सबसे बड़ा कोयला उत्पादक एवं कोयले की खपत करने वाला देश है। चीन में 126.2 बिलियन टन कोल रिजर्व्स का पता लग चुका है जिसमें से प्रतिवर्ष केवल 2.1 बिलियन टन कोयला काम में लिया जा रहा है। इस प्रकार चीन अपने कोयला, गैस एवं पैट्रोलियम पदार्थों के संरक्षण्ा की नीति पर आगे बढ़ रहा है।
प्रतिवर्ष विश्व भर के बाजारों में तेल की जो मांग बढ़ती है उसमें 38 प्रतिशत मांग अकेले चीन की होती है। दुनिया भर में मंदी का दौर आने से पहले वैश्विक बाजार में तेल को महंगा करने का पूरा श्रेय चीन को जाता था। यदि दुनिया भर में मंदी न छा जाती तो आज अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल इतना महंगा होता कि भारतीय अर्थव्यस्था को बहुत करारा झटका झेलना पड़ सकता था। (समाप्त)
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Thursday, August 13, 2009
Wednesday, August 12, 2009
बिजली के पंख लगाकर उड़ने को तैयार है बौना ड्रेगन ! ( पहली किश्त )
कुछ अर्थशास्त्री यह कहकर प्रसन्न होने का प्रयास कर रहे हैं कि इस साल भारत और चीन में विकास दर लगभग आठ प्रतिशत रहेगी। इस वक्तव्य के माध्यम से वे यह जताने का प्रयास कर रहे हैं कि भारत चीन से किसी तरह कम नहीं। जिस प्रकार मुद्रा स्फीती की दर एक मिथ्या एवं अव्यवहारिक सूचकांक सिध्द हुआ है उसी प्रकार विकास दर भी अर्थव्यवस्था का एक भ्रामक तापमापी है जिसमें कई किंतु-परंतु लगे हुए हैं और इससे देश की अर्थव्यवस्था का वास्तविक तापक्रम नहीं नापा जा सकता। इस तापमापी से लिये गये तापक्रम से चीन और भारत के आर्थिक स्वास्थ्य के एक जैसे होने की बात करना, स्वयं को को छलने जैसा है।
चीन न केवल भारत से अधिक आबादी वाला देश है अपितु दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाला देश भी है। चीन का सकल घरेलू उत्पाद लगभग सात ट्रिलियन डॉलर है जबकि भारत का सकल घरेलू उत्पाद तीन ट्रिलियन डॉलर से भी कम है। यदि दोनों देशों की जीडीपी में 8 प्रतिशत की वृध्दि होती है तो चीन की अर्थव्यवस्था में आधे ट्रिलियन डॉलर से भी अधिक की वृध्दि होगी जबकि भारत की जीडीपी में चौथाई ट्रिलियन डॉलर से भी कम की वृध्दि होगी। चीन में प्रति व्यक्ति आय 5300 अमरीकी डॉलर के लगभग है जबकि भारत में यह 650 अमरीकी डॉलर के लगभग है। इस प्रकार भारत और चीन की अर्थव्यवस्था का कहीं कोई मुकाबला ही नहीं है।
कुछ दशक पहले तक चीन दुनिया के अत्यंत पिछड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों में गिना जाता था। 1976 में माओत्से तुंग की मृत्यु के बाद उसने औद्योगिकीकरण का जो सिलसिला आरंभ किया उसके बल पर आज चीन न केवल अपनी दयनीय अर्थव्यवस्था के दायरे से बाहर आ गया है अपितु पूरे संसार के सामने आर्थिक चुनौती बनकर खड़ा हो गया है। चीन ने पूरी दुनिया को यह चुनौती ऊर्जा उत्पादन के बल पर दी है। सन् 2000 से 2004 के बीच चीन ने अपने कुल ऊर्जा उत्पादन में 60 प्रतिशत की वृध्दि की जिसके बल पर उसने अपने देश में वृहत् औद्योगिक क्रांति को जन्म दिया और उसके उत्पाद दुनिया भर के देशों में छा गये। कुछ वर्ष पहले तक दुनिया के बाजार में अमरीका को जो चुनौती जापान से मिलती थी अब चीन से मिल रही है।
आज अकेला चीन दुनिया की 10 प्रतिशत ऊर्जा की खपत करता है। वर्तमान में चीन की विद्युत उत्पादन क्षमता 531 गीगावाट है जबकि भारत की विद्युत उत्पादन क्षमता 147 गीगावाट है। इस प्रकार भारत की तुलना में चीन में 3.5 गुना से भी अधिक बिजली पैदा होती है। जबकि भारत की तुलना में चीन की आबादी सवा गुनी ही है। चीन में प्रति व्यक्ति बिजली की खपत 2176 यूनिट है जबकि भारत में यह केवल 612 है। इस प्रकार आम चीनी आम भारतीय की तुलना में साढ़े तीन गुना बिजली का उपभोग करता है।
चीन ने बिजली उत्पादन की जो तैयारी की है उसे देखकर यही कहा जा सकता है कि बौना ड्रेगन बिजली के पंख लगाकर उड़ने को तैयार है। (शेष कल)
चीन न केवल भारत से अधिक आबादी वाला देश है अपितु दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाला देश भी है। चीन का सकल घरेलू उत्पाद लगभग सात ट्रिलियन डॉलर है जबकि भारत का सकल घरेलू उत्पाद तीन ट्रिलियन डॉलर से भी कम है। यदि दोनों देशों की जीडीपी में 8 प्रतिशत की वृध्दि होती है तो चीन की अर्थव्यवस्था में आधे ट्रिलियन डॉलर से भी अधिक की वृध्दि होगी जबकि भारत की जीडीपी में चौथाई ट्रिलियन डॉलर से भी कम की वृध्दि होगी। चीन में प्रति व्यक्ति आय 5300 अमरीकी डॉलर के लगभग है जबकि भारत में यह 650 अमरीकी डॉलर के लगभग है। इस प्रकार भारत और चीन की अर्थव्यवस्था का कहीं कोई मुकाबला ही नहीं है।
कुछ दशक पहले तक चीन दुनिया के अत्यंत पिछड़ी अर्थव्यवस्था वाले देशों में गिना जाता था। 1976 में माओत्से तुंग की मृत्यु के बाद उसने औद्योगिकीकरण का जो सिलसिला आरंभ किया उसके बल पर आज चीन न केवल अपनी दयनीय अर्थव्यवस्था के दायरे से बाहर आ गया है अपितु पूरे संसार के सामने आर्थिक चुनौती बनकर खड़ा हो गया है। चीन ने पूरी दुनिया को यह चुनौती ऊर्जा उत्पादन के बल पर दी है। सन् 2000 से 2004 के बीच चीन ने अपने कुल ऊर्जा उत्पादन में 60 प्रतिशत की वृध्दि की जिसके बल पर उसने अपने देश में वृहत् औद्योगिक क्रांति को जन्म दिया और उसके उत्पाद दुनिया भर के देशों में छा गये। कुछ वर्ष पहले तक दुनिया के बाजार में अमरीका को जो चुनौती जापान से मिलती थी अब चीन से मिल रही है।
आज अकेला चीन दुनिया की 10 प्रतिशत ऊर्जा की खपत करता है। वर्तमान में चीन की विद्युत उत्पादन क्षमता 531 गीगावाट है जबकि भारत की विद्युत उत्पादन क्षमता 147 गीगावाट है। इस प्रकार भारत की तुलना में चीन में 3.5 गुना से भी अधिक बिजली पैदा होती है। जबकि भारत की तुलना में चीन की आबादी सवा गुनी ही है। चीन में प्रति व्यक्ति बिजली की खपत 2176 यूनिट है जबकि भारत में यह केवल 612 है। इस प्रकार आम चीनी आम भारतीय की तुलना में साढ़े तीन गुना बिजली का उपभोग करता है।
चीन ने बिजली उत्पादन की जो तैयारी की है उसे देखकर यही कहा जा सकता है कि बौना ड्रेगन बिजली के पंख लगाकर उड़ने को तैयार है। (शेष कल)
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Wednesday, August 5, 2009
दालें तो सौ रुपये किलो होनी ही थीं
कोई एक कारण नहीं है कि भारत में दालों का भाव देखते ही देखते सौ रुपये किलो हो गया। हम सबने मिल कर इसे इस भाव तक पहुँचाया है। हमारा लालच हमें अधिक से अधिक धन बटोरने के लिये प्रेरित करता है जबकि ऐसा हो ही नहीं सकता कि कुछ लोग कैसे भी करके अत्यंत अमीर हो जायें और बाकी के लोग उन्हें ऐसा करते हुए देखते रहें। ऐसा कैसे हो सकता था कि केवल भूखण्डों की कीमतें बढ़ती रहतीं और आटा, दाल, सब्जियों और दवाइयों की कीमतें उसी स्तर पर बनी रहतीं!
यह स्वाभाविक ही था कि जब देश में कुछ लोगों के बीच अमीर बनने की होड़ लगी तो चुपके-चुपके हर आदमी उस होड़ में शामिल हो गया। इसका परिणाम यह हुआ कि जो भूखण्ड सौ रुपये गज मिलता था, वह दस हजार रुपये गज हो गया। देखते ही देखते भूखण्डों की खरीद बेच से जुड़े हुए लोगों की जेबों में एक रुपये के सिक्के का स्थान दस रुपये के नोट ने ले लिया और दस रुपये के नोट का स्थान सौ रुपये के नोट ने ले लिया। एक दिन ऐसा भी आया जब सबकी जेबों में हजार-हजार रुपये के नोट हो गये, लेकिन तभी उन्होंने हैरान होकर यह भी देखा कि दुकान पर जो दाल पहले बीस रुपये किलो मिलती थी वह सौ रुपये किलो हो गई। घी सवा दो सौ रुपये किलो और सूखी हुई सांगरियाँ तीन सौ रुपये किलो हो गईं। जो लोग अमीर बनने की होड़ में शामिल हुए थे उन्हें पता ही नहीं चला कि एक रुपये के सिक्के को सौ रुपये में बदलने की होड़ में केवल भूखण्ड खरीदने बेचने वाले ही नहीं अपितु दाल, गेहूँ, चावल और सब्जियां पैदा करने वाले, उन्हें ट्रांसपोर्ट करने वाले, बेचने वाले और खाने वाले भी शामिल हो चुके थे।
बात यहीं पर आकर खत्म नहीं हो गई। जो अरहर की दाल सौ रुपये किलो हो चुकी थी, उसमें मानव प्रजाति के लिये हानिकारक खेसरी की दाल मिलाकर हजार रुपये के नोट को दो हजार रुपयों में बदलने की होड़ आरंभ हुई। घी, तेल, आटा, मैदा, चावल, हल्दी सब में मिलावट आरंभ हुई। सड़ी हुई मिठाइयों में खुशबू मिलाकर बेचा जाने लगा। पुरानी पड़ चुकी सब्जियों को हरे रंग से रंगा जाने लगा। फलों में जहरीले इंजेक्शन लगाये जाने लगे। इन चीजों को खाकर आम आदमी बीमार होकर बड़ी संख्या में हॉस्पीटल पहुंचने लगा। यहाँ भी जो लोग दवा बनाने या बेचने वाले थे उन्हें भी अपनी जेब में पड़े हजार रुपये के नोट को दो हजार रुपयों में बदलने की जल्दी थी। इसलिये उन्होंने नकली दवाइयाँ बनाईं और बेचीं। इंजैक्शनों में पानी भर दिया और गोलियों में लोहे की कीलें डाल दीं। आजाद भारत में यह एक हैरान कर देने वाली बात थी कि हाड़-तोड़ मेहनत करने वाले लोग जीवन भर दो वक्त की रोटी का जुगाड़ ही मुश्किल से करते हुए देखे गये और कामचोरी करने वाले, नकली दवाइयां बेचने वाले, घी में चर्बी मिलाने वाले, शवों से चर्बी निकाल कर बेचने वाले, देखते ही देखते करोड़पति बन गये। इसलिये उन लोगों में भी काम करने के प्रति उत्साह समाप्त हो गया जो मेहनत करके रोटी खाना चाहते थे। चारों ओर कामचोरी का वातावरण बना और आम आदमी एक के दो करने में जुट गया। कर्मचारियों को दिये गये छठे वेतन आयोग के लाभों का इतनी बार और इतना ज्यादा प्रचार हुआ कि दालों को सौ रुपये किलो होने में देर नहीं लगी।
यह स्वाभाविक ही था कि जब देश में कुछ लोगों के बीच अमीर बनने की होड़ लगी तो चुपके-चुपके हर आदमी उस होड़ में शामिल हो गया। इसका परिणाम यह हुआ कि जो भूखण्ड सौ रुपये गज मिलता था, वह दस हजार रुपये गज हो गया। देखते ही देखते भूखण्डों की खरीद बेच से जुड़े हुए लोगों की जेबों में एक रुपये के सिक्के का स्थान दस रुपये के नोट ने ले लिया और दस रुपये के नोट का स्थान सौ रुपये के नोट ने ले लिया। एक दिन ऐसा भी आया जब सबकी जेबों में हजार-हजार रुपये के नोट हो गये, लेकिन तभी उन्होंने हैरान होकर यह भी देखा कि दुकान पर जो दाल पहले बीस रुपये किलो मिलती थी वह सौ रुपये किलो हो गई। घी सवा दो सौ रुपये किलो और सूखी हुई सांगरियाँ तीन सौ रुपये किलो हो गईं। जो लोग अमीर बनने की होड़ में शामिल हुए थे उन्हें पता ही नहीं चला कि एक रुपये के सिक्के को सौ रुपये में बदलने की होड़ में केवल भूखण्ड खरीदने बेचने वाले ही नहीं अपितु दाल, गेहूँ, चावल और सब्जियां पैदा करने वाले, उन्हें ट्रांसपोर्ट करने वाले, बेचने वाले और खाने वाले भी शामिल हो चुके थे।
बात यहीं पर आकर खत्म नहीं हो गई। जो अरहर की दाल सौ रुपये किलो हो चुकी थी, उसमें मानव प्रजाति के लिये हानिकारक खेसरी की दाल मिलाकर हजार रुपये के नोट को दो हजार रुपयों में बदलने की होड़ आरंभ हुई। घी, तेल, आटा, मैदा, चावल, हल्दी सब में मिलावट आरंभ हुई। सड़ी हुई मिठाइयों में खुशबू मिलाकर बेचा जाने लगा। पुरानी पड़ चुकी सब्जियों को हरे रंग से रंगा जाने लगा। फलों में जहरीले इंजेक्शन लगाये जाने लगे। इन चीजों को खाकर आम आदमी बीमार होकर बड़ी संख्या में हॉस्पीटल पहुंचने लगा। यहाँ भी जो लोग दवा बनाने या बेचने वाले थे उन्हें भी अपनी जेब में पड़े हजार रुपये के नोट को दो हजार रुपयों में बदलने की जल्दी थी। इसलिये उन्होंने नकली दवाइयाँ बनाईं और बेचीं। इंजैक्शनों में पानी भर दिया और गोलियों में लोहे की कीलें डाल दीं। आजाद भारत में यह एक हैरान कर देने वाली बात थी कि हाड़-तोड़ मेहनत करने वाले लोग जीवन भर दो वक्त की रोटी का जुगाड़ ही मुश्किल से करते हुए देखे गये और कामचोरी करने वाले, नकली दवाइयां बेचने वाले, घी में चर्बी मिलाने वाले, शवों से चर्बी निकाल कर बेचने वाले, देखते ही देखते करोड़पति बन गये। इसलिये उन लोगों में भी काम करने के प्रति उत्साह समाप्त हो गया जो मेहनत करके रोटी खाना चाहते थे। चारों ओर कामचोरी का वातावरण बना और आम आदमी एक के दो करने में जुट गया। कर्मचारियों को दिये गये छठे वेतन आयोग के लाभों का इतनी बार और इतना ज्यादा प्रचार हुआ कि दालों को सौ रुपये किलो होने में देर नहीं लगी।
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